Yellow 'a-connect' text on a black background.

October 2026

कवर स्टोरी

‘साल’ का जंगल उगाने की अनदेखी दास्तानः घड़ी की टिक-टिक, 30 घंटे की मोहलत

अमित मिश्रा

✅ Link Copied!

सरगुजा में एक शानदार टीम ने साल के बीज से जुड़ी गुत्थी सुलझाकर उस प्राकृतिक जंगल को फिर से हरा-भरा कर दिया, जिसे कभी उगाना असंभव माना जाता था।

भारतीय वानिकी (Forestry) की किताबों में दशकों से एक बात पत्थर की लकीर मानी जाती रही थी-'साल' के पेड़ को इंसान अपनी मर्जी से नहीं उगा सकता। यह जंगल का वो जिद्दी शहंशाह है जो सिर्फ अपनी शर्तों पर जीता है। अगर बीज खुद पेड़ से गिरकर जंगल की पुरानी सड़ी-गली पत्तियों के बीच समा गया, तो शायद उग आए; लेकिन अगर किसी ने उसे क्यारी या नर्सरी में उगाने की जुर्रत की, तो नाकामी ही हाथ लगेगी।

यही वजह थी कि छत्तीसगढ़ के सरगुजा में जब-जब खनन के बाद जमीन खाली हुई, पर्यावरणविदों के चेहरे पर मायूसी छा जाती थी। सबको पता था कि गड्ढों को मिट्टी से भरकर वहां बबूल, नीलगिरी (यूकेलिप्टस) या अकाशिया जैसे बाहरी पेड़ तो खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन सरगुजा की असली आत्मा-यानी साल के घने जंगल-शायद अब दोबारा कभी नहीं लौटेंगे।

लेकिन कुछ लोगों की ज़िद इस तयशुदा सच को मानने को तैयार नहीं थी। ये वो लोग थे जिन्होंने अदाणी की तरफ से साल के जंगलों को वापस लाने का बीड़ा उठाया था।

प्रकृति की छुपी पहेली: बीज गिरते ही शुरू होता है मौत का काउंटडाउन

सवाल बहुत सीधा था, लेकिन जवाब किसी तिलिस्म जैसा: अगर जंगल की जमीन पर गिरा बीज अंकुरित हो सकता है, तो क्यारी की उपजाऊ मिट्टी में वह दम क्यों तोड़ देता है?

इस सवाल का पीछा करने के लिए अदाणी की टीम और स्थानीय जानकारों की एक टोली ने सरगुजा के घने जंगलों में डेरा डाल दिया। महीनों तक पेड़ों से गिरते बीजों की नमी नापी गई, हवा के तापमान का हिसाब रखा गया और मिट्टी की गंध को परखा गया। टीम के सदस्य रहे रिशी बताते हैं कि हम बार-बार फूल और बीज जमा करते लेकिन उनसे पौधे उग ही नहीं रहे थे। तरह-तरह की कोशिशों के बाद प्रकृति का एक बेहद चौंकाने वाला राज खुला।

दरअसल, साल का बीज अमरूद या आम की तरह हफ्तों तक जिंदा रहने वाला बीज नहीं है। पेड़ की टहनी से टूटकर हवा में तैरते हुए जैसे ही वह जमीन छूता है, उसकी जिंदगी का उलटा काउंटडाउन शुरू हो जाता है। उसके पास सांस लेने के लिए सिर्फ 30 घंटे होते हैं। अगर इन 30 घंटों के भीतर उसे ठीक वैसी ही नमी, वैसी ही छांव और वैसी ही मिट्टी नहीं मिली जैसी जंगल की गोद में होती है, तो उसका भ्रूण (Embryo) अंदर ही अंदर सूखकर मर जाता है।

अब तक दुनिया जिसे 'नामुमकिन' मान रही थी, वह दरअसल वक्त और रफ्तार की एक पेचीदा जंग थी।

A hand holds a winged seed, with rows of seedling bags blurred in the background.

जंगल में भोर का अलार्म और बीजों को बचाने की दौड़

राज तो खुल गया, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होनी थी। 30 घंटे का मतलब था कि गलती की कोई गुंजाइश नहीं थी। मई-जून की उस चुभती गर्मी में, जब साल के बीज पककर गिरते हैं। परसा कोल माइंस के हार्टिकल्चर डिपार्टमेंट के डिप्टी मैनेजर वैभव त्रिपाठी, असिस्टेंट मैनेजर श्रीनु कोल्लु और सीनियर ऑपरेटर कमलेश उपाध्याय और उनकी टीम ने सरगुजा के जंगलों में एक अनोखा अभियान शुरू किया।

कमलेश उपाध्याय बताते हैं कि सैकड़ों स्थानीय ग्रामीणों और फील्ड वर्करों की टोलियां भोर में 4 बजे, सूरज उगने से पहले जंगलों में उतर जाती थीं। मकसद था-पेड़ से रात भर में टपके ताजे बीजों को धूप की पहली किरण पड़ने से पहले चुन लेना।

A man in a white hard hat and high-vis shirt stands by a tree in a lush green outdoor setting.

Vaibhav Tripathi

Man in orange and blue work shirt and jeans standing in a field with saplings.

Srinu Kollu

A man in an orange and blue work shirt, jeans, and a white hard hat stands in a nursery full of small plants.

Kamlesh Upadhyay

यह कोई साधारण काम नहीं था; यह बिल्कुल वैसा था जैसे किसी नाजुक मरीज के लिए तय समय में सांस की नली पहुंचाई जाती है। गीली बोरियों और बांस की टोकरियों में बीजों को सुरक्षित रखा जाता ताकि उनकी नमी न सूखे। गाड़ियों और साइकिलों के जरिए इन बीजों को सीधे नर्सरी पहुंचाया जाता, जहां पहले से तैयार खास मिट्टी की क्यारियां उनका इंतजार कर रही होती थीं। घड़ी की सुइयां 30 घंटे का आंकड़ा छूतीं, उससे पहले लाखों बीजों को जमीन के आगोश में सुला दिया जाता।

वह सुबह, जब दशकों पुरानी धारणाएं टूट गईं

नर्सरी में मौजूद लोग हफ्तों तक सांसें थामे इंतजार किया गया। क्या बरसों की वानिकी थ्योरी गलत साबित होगी? क्या इंसानी कोशिशें कुदरत के मिजाज को समझ पाई हैं?

और फिर एक सुबह वह करिश्मा हुआ। क्यारियों की भूरी मिट्टी को चीरते हुए कुछ नन्हीं हरी पत्तियां बाहर निकल आईं। वह साल का अंकुर था। नर्सरी के इतिहास में पहली बार साल का पौधा इंसानी हाथों से सींची गई क्यारी में सिर उठाकर खड़ा था। उस एक अंकुर ने साबित कर दिया कि नामुमकिन कुछ भी नहीं था, बस कुदरत को समझने की फुरसत और सही नीयत की दरकार थी।

A man in an orange hi-vis shirt tends to green plant cuttings on the ground in a forest nursery.
Man in work clothes tending to tree saplings in a forest nursery, preparing them for planting.

खदान के गहरे गड्ढों से आसमान छूती नई जिंदगी

आज उसी मेहनत का नतीजा सरगुजा की फिजाओं में लहरा रहा है। जिन पथरीली और खोदी गई जगहों को लोग बंजर मानकर भूल चुके थे, वहां आज लाखों की तादाद में साल के पौधे खड़े होकर जवान हो रहे हैं। नर्सरी में अभी 'साल' के कुल 1,26,800 पौधे तैयार रखे हैं। इनमें से लगभग 40,000 पौधे (39,876) पिछले साल के हैं और करीब 87,000 पौधे (86,924) इस साल तैयार किए गए हैं।

यह केवल हरियाली की वापसी नहीं है, साल लौटा, तो उसके साए में उगने वाली जड़ी-बूटियां भी लौट आईं। पत्तियों की सरसराहट लौटी, तो तितलियां, भौंरे, तीतर और परिंदे भी अपने पुराने ठिकाने पर वापस आ गए। स्थानीय आदिवासियों के लिए, जो सदियों से साल को अपना कुलदेवता मानते आए हैं, यह सिर्फ जंगल का उगना नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और पुरखों की विरासत का पुनर्जन्म है।

सरगुजा की यह दास्तान बताती है कि जब इंसान कुदरत पर हुक्म चलाने के बजाय उसके कायदों को समझकर उसके साथ कदमताल करता है, तो रेगिस्तान जैसे बंजर में भी जिंदगी अपनी पूरी रवानी के साथ लौट आती है।